Text Bhajan
भाई ज्ञानी सोई कहिये
भाई ब्रह्म विराजै कैसा
भाई ब्रह्मज्ञान नहिं जाना रे
प्राणी लाल छांडो मन चपलाई
प्रानी ये संसार असार है
भजि मन प्रभु श्रीनेमि को
भाई अब मैं ऐसा जाना
भाई कहा देख गरवाना रे
भजि मन प्रभु
प्राणी आतमरूप अनूप है
अब हम नेमिजी की
देख्या मैंने नेमिजी
भजि मन प्रभु
देखो भाई श्रीजिनराज विराजैं
देख्या मैंने नेमिजी प्यारा
धनि ते साधु रहत वनमाहीं
धनि धनि ते मुनि गिरी
तू जिनवर स्वामी मेरा
दरसन तेरा मन भाये
देखे जिनराज आज राजऋद्धि
देखे सुखी सम्यकवान
ज्ञान ज्ञेयमाहिं नाहि ज्ञेय
ज्ञान बिना दुख पाया रे
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै
ज्ञानी जीव दया नित पालैं
तुम प्रभु कहियत दीनदयाल
जिनके हिरदै प्रभुनाम नहीं
जिनवरमूरत तेरी शोभा
जो तैं आतमहित नहिं कीना
ज्ञान का राह दुहेला रे
ज्ञान का राह सुहेला रे
ज्ञान को पंथ कठिन है
जब बानी खिरी महावीर
जानो धन्य सो धन्य सो धीर
जानौं पूरा ज्ञाता सोई
गहु सन्तोष सदा मन
गुरु समान दाता नहिं
चेतन नागर हो तुम चेतो
चेतन प्राणी चेतिये हो
जग में प्रभु पूजा सुखदाई
क्रोध कषाय न मैं
सबसों छिमा छिमा कर
कारज एक ब्रह्महीसेती
किसकी भगति किये हित
काहे क्रोध करे
कर मन वीतराग को ध्यान
कर रे तू आतम हित
कलि में ग्रन्थ बड़े उपगारी
कहत सुगुरु करि सुहित
कहिवे को मन सूरमा